Tuesday, November 10, 2015

देशप्रेम, त्याग परिवार में रहेगा तभी



राजगुरू, सुखदेव, भगत सिंह जैसे वीर, कैसे होंगे पैदा आज कोई तो बताईए
भटकी जवानी यहां आचरण मैला हुआ, पहले सम्मान मात्रशक्ति को दिलाईए
देशप्रेम, त्याग परिवार में रहेगा तभी, पहले इतिहास इन्हें वीरों का पढाईए—
रानी लक्ष्मी बाई और तस्वीर दुर्गा की, घर—घर जाकरके मांओं को को दिखाईए।
                                                                                         सुदेश यादव जख्मी
                                                                                             कवि/पत्रकार

Wednesday, November 4, 2015

बनना था सुभाष चन्द्रशेखर

बलिदानी, सूरवीर, भारत में पैदा हुए
तभी तो आजादी हम सबको दिला गए
पाठ देशप्रेम, भाईचारे और एकता का
जाते—जाते पूरी युवा पीढी को पढा गए
हमने ही उनका बताया मार्ग नहीं चुना
जात—पात धर्मो से हमी टकरा गए
बनना था सुभाष चन्द्रशेखर सा वीर हमें—
हमीं राष्ष्ट्रदोहियों में नाम लिखवा गए। 
डा0 सुदेश यादव जख्मी
 कवि/पत्रकार

Tuesday, November 3, 2015

मिलके जतन करें, देश में हो भाईचारा


मिलके जतन करें, देश में हो भाईचारा
शत्रु जो भी देश के हैं, उन्हें ललकार दो
नारियों का आदर हो, बेटियों की रक्षा करें
बुर्जुगों को सम्मान, बालकों को प्यार दो
कोई भी पडौसी देश, सीमाओं के पार रहे
घूरने लगे जो कोई, उसे फटकार दो
जिसमें जनम मिला, चन्दन सी धूल है वो—
अपने तिरंगे पे ये, तन—मन वार  दो।
डा0 सुदेश यादव जख्मी
 कवि/पत्रकार

Thursday, October 29, 2015

कब से तन्हाईयों के थे हम साथ में


कब से तन्हाईयों के थे हम साथ में
बाद मुददत के वो हमको कल मिल गये
चित्र आंखों में गुजरे उतरने लगे—
मुस्कुराहट भरे चार पल मिल गये।।
              कवि सुदेश यादव जख्मी

Friday, June 5, 2015

मैं भी राजा बनूंगा


साथ तेरे चलूंगा, यूं ही उम्र भर।
धोखा देने की तूने जो ठानी न हो।।
मैं भी राजा बनूंगा,तू रानी मेरी—
गर तेरे मन में कोई, बेमानी न हो।।
        डा0 सुदेश यादव जख्मी

Tuesday, March 24, 2015

घनाक्षरी छंद


संस्कार लुप्त हुए, सभ्यता विलुप्त हुई,
चरित्र हनन हुआ, कैसा रामराज है।
वासनायें नग्न हुई, बन्धनों के हाथ खुले,
रिश्ते तार—तार हुए, कैसा ये समाज है।।
मातृभूमि मातृशक्ति,खूं के आंसू रोती यहां,
राष्ट्रद्रोही दानवों को आती नहीं लाज है।
छाया कैसा ये जुनून,पानी हो गया है खून, 
बहन और बेटियों को, बेचते ये आज हैं।।
          कवि वैद्य सुदेश यादव जख्मी

Sunday, March 8, 2015

तू मेरी जिन्दगी उसकी सौगात है

 
                                                       तू मेरी जिन्दगी रब की सौगात है।
तू ही सुबहा मेरी तू मेरी रात है।।
यूं तो देखे हसीं हमने लाखों मगर—
जो किसी में नहीं तुझमें वो बात है।।
         कवि— सुदेश यादव जख्मी