Saturday, March 26, 2016

हमनें नाग पाले हैं



किसे दिखलायें हम दिल में, हमारे कितने छाले हैं
हमारे रहनुमाओं के, अजब करतब निराले हैं
अदालत हो गई लाचार, बेबस और पंगु क्यों—
जो डसते हैं हमें हरपल, वो हमनें नाग पाले हैं।।
             कवि सुदेश यादव जख्मी

Tuesday, March 22, 2016

लेके पिचकारी आ जाओ


लेके पिचकारी आ जाओ खलिहान में
तुमको बांहों का झूला झुलायेंगे हम
रंग डालेंगे दामन हरे रंग से
गीत अपनी मुहब्बत के गायेंगे हम

पहले ऐसे कभी तुमको देखा नहीं
फाग आते रहे फाग जाते रहे
आज तुम राधिका जैसी हमको लगी
सोचते हैं कृष्ण बन भी पायेंगे हम


पीली सरसों कहीं देख ले न हमें
आओ गुलमोहर की छांव में हम चलें
तुम भिगो दो हमें हम भिगो दें तुम्हें
ऐसी छब्बीसवी होली मनायेंगे हम

गेंहू की बालियां हंस रही देख लो
फूल भंवरों से करते हैं अठखेलियां
ऐसे मौसम में ये दूरियां किस लिये
आओ जख्मी गले से लगायेंगे हम।।
डा0 सुदेश यादव जख्मी