Tuesday, July 24, 2018

तुम भले ही किसी और के हो गये





तुम भले ही किसी और के हो गये
हमने अब तक भी तुमको भुलाया नहीं
लाख चेहरे मिले थे मुहब्बत लिये
दूसरा कोई चेहरा ही भाया नहीं।

याद आते हैं जब साथ गुजरे वो पल
साथ मेरा ये धडकन भी देती नहीं 
मेरे दिल के हिमालय से होती हुई
तेरे यौवन की गंगा भी बहती नहीं
जो भी मैं आज हूं, हूं बदौलत तेरी
साथ मेरे तो मेरा ही साया नहीं
तुम भले ही किसी और के हो गये...

जब मिले तुमसे देखा था पहली दफ़ा
चांद उस दिन से फिर हमने देखा नहीं
कितना है तंग दिल ये जहां बेख़बर
कोई ऐसा भी होगा ये सोचा नहीं
बिन तुम्हारे ये सूना है सारा जहां
दूसरा तुमसा रब ने बनाया नहीं
तुम भले ही किसी और के हो गये...

आज भी मेरे दिल में लगी है तेरी
मूर्ति जो हटाने से हटती नहीं
यादों का ही सहारा मेरे पास है
ज़िन्दगी ऐसे तन्हा तो कटती नहीं
क्या लिखा है मुकददर में किसको पता
हमनें तो दिल कहीं भी लगाया नहीं
तुम भले ही किसी और के हो गये...

तुम जहां भी रहो हंसते गाते रहो
अपने जो भी  हैं ग़म सब मुझे दीजिये
अब तसव्वुर में बस मेरे आते रहो
मेरी खुशियां हैं जो भी वो ले लीजिये
इस तबस्सुम की ख़ातिर बना दिव्य मैं
दर्द अपना किसी को बताया है
तुम भले ही किसी और के हो गये...
                कवि सुदेश यादव दिव्य
                 मो0 9368666665