Monday, October 20, 2014

तन्हाईयां


तन्हाईयां   हैं  और  मैं,अन्जाना सफर है।
जबसे  गये  हो न कोई खत है न,खबर  है।।
 करते हैं चांद—तारे भी आकर के ठिठोली—
यादों का सिलसिला ही यहां आठो पहर है।।
             डा0सुदेश यादव जख्मी
                  कवि/साहित्यकार







आ मेरे प्यार मैं जी भर के तुझे प्यार करूं


मैं  तेरी  सौख अदाओं पे, जां निसार करूं।
जब तलक जान है, दीदार ही दीदार करूं।।
दूर रहना तो गवारा नहीं एक पल तुझसे—
 आ मेरे प्यार मैं जी भर के तुझे प्यार करूं।।
              डा0 सुदेश यादव जख्मी
                कवि/साहित्यकार

आंख में आंसू भर—भर आये, सावन में


वो  हमको   ऐसा  बिसराये,  सावन   में
आंख में आंसू भर—भर आये, सावन में

बिजली  चमके  बादल  गरजे,  डर जाउं
रिमझिम मन में प्यास जगाये,सावन में

खिलते  फूल  महकती कलियां, न भायें
पुरवा   बैरन  आग  लगाये ,सावन   में

इतना  हरजाई  निकलेगा,  सनम मेरा
इश्क  किया  करके  पछताये, सावन में

पिछले खत पढ—पढ के ये दिल,रोता है
अब  विरहन से  सहा  न जाये, सावन में

क्या  लेना  दुनियां  से मुझको, बिन तेरे
दिलकश  ये  मौसम  न  भाये, सावन में

नहीं  गिला, शिकवा  हमको, बेगानों से
जख्मी  ने  ही  जख्म  लगाये,सावन में

        डा0सुदेश यादव जख्मी
    कवि/साहित्यकार

कौन तीरथ करायेगा मां—बाप को...


Saturday, October 11, 2014

तोडकर बंधनों को जमाने के हम


तोडकर  बंधनों  को  जमाने  के हम।
बांधकर  प्रेम  धागे  चलो  हम चलें।।
   इस जमीं पर कहीं मनवा लगता नहीं—
आसमानों  से  आगे  चलो  हम  चलें।।
           डा0 सुदेश यादव जख्मी
                कवि/साहित्यकार

Sunday, October 5, 2014

हमने माना कि हम प्यार करने लगे


 हमने माना कि हम प्यार करने लगे
देखकर   आईना  तुम  संवरने  लगे
  दूरियां  देखकर  हमको ऐसा लगा— 
आप तो इस जमाने से डरने लगे।।
      डा0सुदेश यादव जख्मी
            कवि