Saturday, August 31, 2013

वो काला तिल नहीं होता



तेरे  दिल  के  लिये  बेचैन मेरा दिल नहीं होता

        तसव्वुर में तेरा आना कभी शामिल नहीं होता

          भले पहले से जख्मीं हूं मगर दीवाना ना होता—
 अगर रूखसार पर तेरे वो काला तिल नहीं होता।।

दिल लगाने की बातें करो



                                   आज  मौसम  गुलाबी  हुआ,दिल लगाने की बातें करो
                                   दूरियां   ना   रहें  बीच   में   पास  आने  की बातें करो

                                   मस्त पुरवा के झोके चले,गुल से  बतला रही तितलियां
                                   तुम भी घूंघट शरम—लाज का,अब उठाने की बातें करो

                                   जानें कब का ये दिल दे दिया,तुमको पहली मुलाकात में
                                   मेहरबां अब  तो हो जाईये, अब  ना  जाने  की बातें करो

                                   ये   अदा   नाजुकी   आपकी,  जान  ले  ले  ना ये सादगी
                                   खुद  को  दीवानों  की  भीड  से,अब बचाने की बातें करो

                                   बिन   तुम्हारे  गुजारा  नहीं,  और  कोई  भी प्यारा नहीं
                                  दिल में  क्या  राज  है खोलिये, और बताने की बातें करो

                                  प्यार  दीवाना  जख्मीं  हुआ, आज  भा  ये  ना तन्हाईयां
                                  साथ  लेकर  नया  आशियां, अब  बनाने  की  बातें  करो

                                                                        डा0सुदेश यादव जख्मीं
                                                                             कवि/पत्रकार

भले ही हमें ना पुकारा

भले  ही  हमें  ना  पुकारा करो तुम
मगर अपनें  गेंसू  संवारा  करो तुम।

ये  चेहरा  खिला  है कंवल की तरह
ये निखरा  बदन  गंगाजल की तरह
ना यूं तीर नजरों के मारा करो तुम।
मगर अपनें गेंसू..............

ये    उलझी   लटें   और   ये  सादगी
हो  जैसे   बहारों   की  ये    ताजगी
करीब आओ यूं ना किनारा करो तुम।
मगर अपनें गेंसू..............

तुम्ही   चांद   तारों   की   बारात   हो
हमें  तो   खुशी   है  कि  तुम साथ हो
कभी दिल ये रोशन हमारा करो तुम। 
मगर अपनें गेंसू..............

अगर   तेरे   गेसू    संवर   जायेंगे
घटाओं  से  बादल  बिखर  जायेंगे
बरस जायेंगे गर इशारा करो तुम।
मगर अपनें गेंसू..............

ये  माना  खुदा   की  हो  तस्वीर तुम
मगर जख्मीं की तो हो तकदीर तुम
जिताकर हमें खुद भी हारा करो तुम
मगर अपनें गेंसू..............

Thursday, August 22, 2013

अंखियों से अंखियां


अंखियों से अंखियां क्या मिल गई दोस्तो, 
उनको  भी  अपने  ख्याल  आने लगे हैं
हमने  भी  तोडी हैं हदें दीवाने पन वाली,
मिलने को हम रात में भी जाने लगे हैं।

नजरों के जब से लडे हैं  पेच दोनों ओर,
पुष्पों  पे  प्रेम  के  पराग आने  लगे हैं
धडकनें  ऐसा  महसूस  करती  है  हाय,
वो जो नहीं है तो मेरी जान जाने लगे है।

सांस—सांस में घुली है जबसे बताउं कैसे,
अधरों  पे  उनका  ही  नाम  आने लगा है
नाजुक  सा  दिल ये चुरा गये हैं जबसे वो,
जिंदगी में प्यार का तूफान आने  लगा है।

हमने जो वादे वफा उनसे किये थे कभी,
जान  देके  अपनी भी  उनको निभाएंगे
दामन  पे  उनके ना दाग आने देंगे हम,
बंधन  में  सात  फेरों  के  बांध लाएंगे।

आएंगे चमन में वो कलियां खिलेंगी चहूं
तितली  अलि  भी  राग प्रेम का सुनाएंगे,
गेसूओं की छांव में विश्राम करें जख्मी जी,
दामन  से  अपनी  वो  बीजना झिलाएंगे।।

Wednesday, August 21, 2013

सरस्वती वंदना

   
तेरे चरणों से नहीं दूर मॉं
पग धूल सा तेरा दास है
स्वर दायनी स्वर साधनी—
मधु—स्वर की मुझको तलाश है।
तेरे चरणों से..........
हुई क्या खता ये बता मुझे
स्वर भीख दे ना सता मुझे
मेरे मुख में अम्र्रत घोल दे-
कहे आती—जाती ये सांस है।।
तेरे चरणों से..........
नासमझ सका नासमझ हूं मैं
तेरे हाथ की ही उपज हूं मैं
मैं हूं इक किरण तेरे नूर की—
सारे जग में तेरा प्रकाश है।
तेरे चरणों से..........
नये शब्दों का सागर मिले
करूं वंदना आदर मिले
जख्मीं जहां सुनकर मगन—
हो जाये ये विश्वास।।
तेरे चरणों से..........
     डा0सुदेश यादव जख्मीं
         कवि/पत्रकार

Monday, August 19, 2013

मां

कोई उल्झन सता नहीं सकती
बेकरारी   बढा   नहीं  सकती
अपनी मां के जो पैर छूता हो—
मौत भी पास आ नहीं सकती।

आशियानें पे बिजली गिरी

मुस्कुराने के दिन आये थे आशियानें पे बिजली गिरी
कोई छोटा—बडा ना बचा हर ठिकाने पे बिजली गिरी
याद आने लगे अब हमे उनकी बांहों में गुजरे वो पल—
जब उन्होंने नजर फेर ली दिल दीवाने पे बिजली गिरी।

Saturday, August 17, 2013

बांहों में समा जाओ

कुछ कम मिला है वक्त को जाया ना कीजिये
बांहों  में  समा  जाओ  सताया  ना   कीजिये
हम  पर  भी  बरस जाने दो दो बूंद प्यार की—
जुल्फों  मे  बादलों  को  छुपाया ना कीजिये।

शाम ढली

शाम ढली  और  रात  कटी रोते—रोते
सोचो   कैसे   तन्हाई   में   हम   सोते
दिल की बात तुम्हारा दिल भी सुन लेता—
काश  हमारे  साथ  रात  तुम  भी  होते।

Thursday, August 15, 2013

चाहें जितने सितम कर लो

प्यार करता हूं मैं तुमसे यकीं मुझ पर सनम करलो
तमन्ना है यही मेरी मुझको बांहों में तुम भर लो
मुझे गर मौत भी आये तेरी आगोश में आये—
भुलायेंगे तुम्हें ना हम चाहें जितने सितम कर लो।

भगवान भी तुम हो

मेरी  जान   भी   तुम  हो  मेरी  शान   भी तुम हो
मेरी जाने  तमन्ना  और  मेरा  ईमान भी तुम हो 
पुकारूं मैं तुम्हें किस नाम से मुझको बता हमदम—
मेरा महबूब भी तुम हो मेरा भगवान भी  तुम हो।

हम वीर बहादुर हैं


हम वीर बहादुर हैं हम तेरे जाये हैं
चरणों मे चढाने को सर अपना लाये हैं

तू गम ना कर माता सीमा पे खडे हैं हम
तू जहां—जहां चाहे फहरा देंगे परचम
तेरी खुशियों का हम संकल्प उठाये हैं।

तेरी गोद में खेले हम घुटनों चल बडे हुये
अब रक्षा की खातिर हथियार ले खडे हुये
संगीन  उठाते  ही  दुश्मन  घबराये  हैं।

आजाद तुझे करने को वीरों ने दी कुर्बानी
हम उनके अनुयायी जो वीर थे बलिदानी
उन्हें कैसे भुला दें हम आजादी दिलाये हैं।

जांबाज सिपाही हैं गौरव तेरा है मां
तन—मन—धन जो भी है ये सब तेरा है मां
सर अपना हथेली पर हम भी तो उठाये हैं।

भारत माता तेरे है शान तिरंगे की
जां देके भी रखेंगे हम आन तिरंगे की
जख्मीं भारत माता गुण तेरे गाये है।

आजादी दिलाये थे

किये उपकार भरत पर जो आजादी दिलाये थे
सभी वर्गो का था सहयोग मां के काम आये थे
तभी तो खून के बदले में आजादी का नारा था—
ये  नारा वीर  नेताजी  भी  खूं देकर लगाये थे।

शत् शत् नमन

जो   तिरंगे   को   उंचा  उठाकर  गये
दुश्मनों  के  जो  छक्के छुडाकर गये
उन शहीदों को मेरा है शत् शत् नमन
देश  पर  जान  अपनी लुटाकर गये।

आजाद कर गये वो

इस देश के चमन को आबाद कर गये वो
दुश्मन फिरंगियों को बर्बाद कर गये वो
कितनों ने फंदे चूमे कितनो ने खायी गोली—
होकर  शहीद हमको आजाद कर गये वो।

आजादी की कहानी।

कुछ इस तरह गुजारी छोटी सी जिन्दगानी
वो  जानते  थे  सारे सारा जहां है फानी
चरणों में सर चढाकर वो तो अमर हुए हैं—
निज खून से लिखे जो आजादी की कहानी।

प​श्चिचम का असर

प​श्चिचम का असर देखिये जाता ही नहीं है
मक्का की रोटी साग वो खाता ही नहीं है
है आंख पे चश्मा तो मोबाइल है कान पर—
कपडा भी उसको तन पे सुहाता ही नहीं है।

बिखर गए होते

तुम ना मिलते तो मर गए होते
खुद कुशी यार कर  गए होते
तूने इस दिल को दिल से जोडा है—
वर्ना कब के बिखर गए होते।

क्यों सता रहे हो

जुल्फों में मस्त गजरे अब क्यों लगा रहे हो
जब छोडकर के हमको तुम दूर जा रहे हो
ये खुशबुओं का मौसम ना जाने कब मिलेगा—
खुशबू लुटा लुटाकर अब क्यों सता रहे हो।

निगाह फेरी है

आज  तन्हा  हयात  मेरी  है
चाह इस दिल को सिर्फ तेरी है
दिल ही दुश्मन हुआ है मेरा तो—
जब से  तूने निगाह  फेरी  है।

सावन का महीना



बिजली चमक रही है बादल बरस रहे हैं
पुरवा के मस्त झोंके बांहों में कस रहे हैं
सावन का महीना है क्या काली घटा छायी—
वहां तुम तरस रहे हो यहां हम तरस रहे हैं

चाहत

     

तुम्हें पाने की चाहत में किसी के हो नहीं पाये
रही दीदार की चाहत अभी तक जो नहीं पाये
हमारी याद में तुम भी कहीं बेचैन रहते हो—
हमें सपनों में आना था मगर तुम सो नहीं पाये।