Saturday, March 16, 2024

लगा लो गले

लगा लो गले ना, बनो बेरहम

मुहब्बत का हमपे भी कर दो करम।


चले आओ होली का करके बहाना

तुम्हें चाहते हैं हम रंग लगाना

बड़ी दूर से आये, मिलने को हम

मुहब्बत का हमपे भी कर दो करम।


गुलों का है मौसम समा प्यारा—प्यारा

अगर चाहो दिल आज रख लो हमारा

उदासी को रंगों से, कर भी दो कम

मुहब्बत का हमपे भी कर दो करम।


वो देखो गुलों पर भ्रमर गा रहे हैं

बसंती है रूत मस्त दिन आ रहे हैं

गई ठण्ड मौसम, हुआ है गरम

मुहब्बत का हमपे भी कर दो करम।

      कवि डा. सुदेश यादव दिव्य


हमारा भारत देश महान

 हमारा भारत देश महान—हमारा भारत देश महान

बदल रहा है देश हमारा, जग करता सम्मान।

हमारा भारत देश महान...


डर का सामराज्य हटा, अपराध भी है घटा

खुली सांस लेने लगा, आज आम आदमी

रंगदारी लूटपाट, माफियों के ठाटबाट

नारियों के शोषण में आई है बड़ी कमी

सुविधाओं का सही समय पर है, आदान—प्रदान।

हमारा भारत देश महान...

सेनायें हैं बलशाली, सीमाओं की रखवाली

शत्रुओं के लिये सदा रहतीं तैयार हैं

किसकी मजाल कोई घूर सके भारत को

भारत के वीर लोहालाट दमदार हैं

वीर सिपाही निज भारत की बढ़ा रहे हैं शान।

हमारा भारत देश महान...

राम के हैं अनुयायी, आपस में भाई भाई

साथ साथ रहते, विवाद किस बात का

आपस में लड़ रहे, हम ये भी भूल गये

आदमी मुसाफिर है, बस एक रात का

हमें दिया है ऋषि मुनियों ने यहां ज्ञान विज्ञान।

हमारा भारत देश महान...

रामराज लाना होगा, देश को बचाना होगा

युवाओं के हाथ में ही, सारी बागडोर है

हमें तो समझना है, अपना कर्म करना है

फल देने वाला तो यहां पे कोई और है

हमको दिव्य बदलना होगा, समय बड़ा बलवान।

हमारा भारत देश महान...

          कवि सुदेश यादव दिव्य


मैं गीत सुनाता हूं

 




होली का ये त्यौहार है मस्ती में आईये

मैं गीत सुनाता हूं, तो ताली बजाईये।


भीगा हुआ बसंत का मौसम ये सुहाना

फूलों पे झूमते हुये भवरों का वो गाना

आओ इन्हीं के साथ में होली मनाईये।


पागल दीवाने मनचले सडको पे आ गये

इतना उड़ा गुलाल के बादल से छा गये

कई तो कह रहे हैं चलो कुछ मंगाईये।


भाभी कहीं रंगी पड़ी देवर कहीं पड़े

साली दिखाती जीजा को नखरे बड़े—बड़े

कोई कह रही है आईये, कोई बोले जाईये।

         डा. सुदेश यादव दिव्य

Tuesday, March 5, 2024

आया बसंत


 आया बसंत देखो, फैली हरियाल है

पीली सरसों ने तो बस नींद चुरा ली है।


फाग का महीना आया, कोयल ने गीत गाया

बच्चे चले लेके पिचकारियों से खेलने

कई रंग वाले फूल, डालियों पे रहे झूल

चले मस्त भंवरे, फुलवारियों से खेलने

कलियों से लदी देखो, अब हर एक डाली है

पीली सरसों ने तो बस नींद चुरा ली है।


कहीं है अबीर और कहीं है गुलाल देखो

कहीं भरे कई रंग वाले गुब्बारे हैं

देवरों को खोज रहीं आज सारी भाभियां भी

कोई भंग पीके एक, दूसरे को मारे है

हमने भी दोस्तों से कल एक मंगा ली है

पीली सरसों ने तो बस नींद चुरा ली है।



स्वस्थ मस्त युवाओं की टोलियां भी घूम रहीं

जो भी मिले राह में गुलाल लगा देते हैं

जहां लगा डीजे देखा, थोडी देर वहीं रूके

दोस्तों के साथ में ही ठुमके लगा लेते हैं

सब देख के मुस्काती गेहूं की बाली है

पीली सरसों ने तो बस नींद चुरा ली है।


कहीं हैं पकोडे कहीं दही के बडे बने हैं

कहीं पानी पूरी संग तीखा जलजीरा है

कहीं आके बरसाने राधा संग खेलती है

कहीं रंगी माधव की भगती में मीरा है

रचना ये दिव्य ने भी होली पे बना ली है

पीली सरसों ने तो बस नींद चुरा ली है।

          डा. सुदेश यादव दिव्य

          अराध्या प्रकाशन, मेरठ

          मो. 9027687780