ehshash dil ka
Thursday, July 31, 2014
जख्म हंसकर वो देते हैं
जख्म हंसकर वो देते हैं,जख्म सिलने नहीं देते
कत्ल नजरों से करते हैं नजर मिलने नहीं देते
गजब अंदाज है इनका खुदा इनसे बचा हमको—
शिकायत क्या करे कोई,जुबां हिलने नहीं देते
डा0सुदेश यादव जख्मी
साहित्यकार/पत्रकार
बहुत उदास है मन आ जाओ
बहुत उदास है मन आ जाओ
याद में जलता है बदन आ जाओ
हसरतों और न तडफाओ मुझे—
हो भी जाने दो मिलन आ जाओ
डा0सुदेश यादव जख्मी
साहित्यकार/पत्रकार
Monday, July 28, 2014
मस्त सावन का मौसम चले आईये
मस्त सावन का मौसम,चले आईये।
बूंदें पड़ती हैं छम—छम,चले आईये।।
ये बतायेंगे मिलकर,तुम्हें रूबरू—
कितने बेचैन हैं हम,चले आईये।।
डा0सुदेश यादव जख्मी
साहित्यकार/पत्रकार
Wednesday, July 23, 2014
तुम्हारी जुल्फ के बादल से कुछ बूंदें चुराउंगा
तुम्हारी जुल्फ के बादल से कुछ बूंदें चुराउंगा।
तुम्हारी आंख के काजल में फिर उनको मिलाउंगा।।
लिखूंगा फिर गजल कोई तुम्हारी मुस्कुराहट पर—
सुनोगे प्यार से गर तुम, तुम्हें गाकर सुनाउंगा।।
डा0सुदेश यादव जख्मी
कवि/पत्रकार
एक मुक्तक आज के मौजूदा हालात पर
वतन कैसे सबल होगा,ये भ्रष्टाचार है जब तक।
मरीजों से मसीहा का,गलत व्यवहार है जब तक।।
जिन्हें चाहत है करने की,उन्हें करने नहीं देते—
व्यवस्था कैसे सुधरेगी,यहां गददार हैं जब तक।।
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