Sunday, October 9, 2022

कितने युग बीत गये

कितने युग बीत गये, श्रीराम जी आ जाओ

भक्तों की पीर बढी, अब धीर बंधा जाओ।


मर्यादायें बिखरीं, बिखरे रिश्ते—नाते

नल, नील को केवट को अब साथ मिला जाओ।


अब भरत, लखन जैसे, मिलते ही नहीं भाई

अपनों से अपनापन, अब हमको सिखा जाओ।


ना आज्ञाकारी हैं, तुमसे अब के बच्चे

श्रद्धा, सेवा मन में, अब आके जगा जाओ।


श्रीराम नमन तुमको, आदर्श हमारे हो

अपनी किरपा फिर से, आकर बरसा जाओ।


तुमसा ना हुआ कोई, पुरूषोत्तम धरती पर

आतंक, अराजकता, आकर के मिटा जाओ।


अज्ञान, अंधेरा है, अन्तर्मन कलुषित है

इस दिव्य के दिल में भी, निज ज्योति जला जाओ।

डा. सुदेश यादव दिव्य

अराध्या प्रकाशन, मेरठ 

मो. 9027687780


Tuesday, October 4, 2022

क्यों समय व्यर्थ हो

 शब्द हूं मैं अगर उसका तुम अर्थ हो

मेरे जीवन की तुम ही तो सामर्थ हो

बिन तुम्हारे तो मैं शून्य जैसा हुआ—

मान जाओ प्रिय क्यों समय व्यर्थ हो।।

            डा.सुदेश यादव दिव्य

Thursday, April 7, 2022

तुमने सिखला दी मुझको मक्कारी

 तुमसे में दूर बहुत अच्छा था।

कितना भोला था और सच्चा था।।

तुमने सिखला दी मुझको मक्कारी—

बिन तुम्हारे मैं बहुत अच्छा था।।

         डा.सुदेश यादव दिव्य