कितने युग बीत गये, श्रीराम जी आ जाओ
भक्तों की पीर बढी, अब धीर बंधा जाओ।
मर्यादायें बिखरीं, बिखरे रिश्ते—नाते
नल, नील को केवट को अब साथ मिला जाओ।
अब भरत, लखन जैसे, मिलते ही नहीं भाई
अपनों से अपनापन, अब हमको सिखा जाओ।
ना आज्ञाकारी हैं, तुमसे अब के बच्चे
श्रद्धा, सेवा मन में, अब आके जगा जाओ।
श्रीराम नमन तुमको, आदर्श हमारे हो
अपनी किरपा फिर से, आकर बरसा जाओ।
तुमसा ना हुआ कोई, पुरूषोत्तम धरती पर
आतंक, अराजकता, आकर के मिटा जाओ।
अज्ञान, अंधेरा है, अन्तर्मन कलुषित है
इस दिव्य के दिल में भी, निज ज्योति जला जाओ।
डा. सुदेश यादव दिव्य
अराध्या प्रकाशन, मेरठ
मो. 9027687780