Tuesday, March 24, 2015

घनाक्षरी छंद


संस्कार लुप्त हुए, सभ्यता विलुप्त हुई,
चरित्र हनन हुआ, कैसा रामराज है।
वासनायें नग्न हुई, बन्धनों के हाथ खुले,
रिश्ते तार—तार हुए, कैसा ये समाज है।।
मातृभूमि मातृशक्ति,खूं के आंसू रोती यहां,
राष्ट्रद्रोही दानवों को आती नहीं लाज है।
छाया कैसा ये जुनून,पानी हो गया है खून, 
बहन और बेटियों को, बेचते ये आज हैं।।
          कवि वैद्य सुदेश यादव जख्मी

Sunday, March 8, 2015

तू मेरी जिन्दगी उसकी सौगात है

 
                                                       तू मेरी जिन्दगी रब की सौगात है।
तू ही सुबहा मेरी तू मेरी रात है।।
यूं तो देखे हसीं हमने लाखों मगर—
जो किसी में नहीं तुझमें वो बात है।।
         कवि— सुदेश यादव जख्मी