संस्कार लुप्त हुए, सभ्यता विलुप्त हुई,
चरित्र हनन हुआ, कैसा रामराज है।
वासनायें नग्न हुई, बन्धनों के हाथ खुले,
रिश्ते तार—तार हुए, कैसा ये समाज है।।
मातृभूमि मातृशक्ति,खूं के आंसू रोती यहां,
राष्ट्रद्रोही दानवों को आती नहीं लाज है।
छाया कैसा ये जुनून,पानी हो गया है खून,
बहन और बेटियों को, बेचते ये आज हैं।।
कवि वैद्य सुदेश यादव जख्मी

