Wednesday, August 21, 2013

सरस्वती वंदना

   
तेरे चरणों से नहीं दूर मॉं
पग धूल सा तेरा दास है
स्वर दायनी स्वर साधनी—
मधु—स्वर की मुझको तलाश है।
तेरे चरणों से..........
हुई क्या खता ये बता मुझे
स्वर भीख दे ना सता मुझे
मेरे मुख में अम्र्रत घोल दे-
कहे आती—जाती ये सांस है।।
तेरे चरणों से..........
नासमझ सका नासमझ हूं मैं
तेरे हाथ की ही उपज हूं मैं
मैं हूं इक किरण तेरे नूर की—
सारे जग में तेरा प्रकाश है।
तेरे चरणों से..........
नये शब्दों का सागर मिले
करूं वंदना आदर मिले
जख्मीं जहां सुनकर मगन—
हो जाये ये विश्वास।।
तेरे चरणों से..........
     डा0सुदेश यादव जख्मीं
         कवि/पत्रकार

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