Monday, March 12, 2018

होरी के दोहे


लहिं पिचकारी हाथ मँह, आवहुँ री! प्रिय जाँन |
खेलन होरी नेह सों, चलहिं खेत खलिहान ||

बाँहिंनु झूला झूलिहैं, रँगु डारिहुँ बरजोरि |
आवहु खेलहिं फाग प्रिय! ​विनती मम करजोरि ||

नहिं निरखा तुमकों कभी, निकरि गए बहु फाग |
तुम राधे सम लागिहों, ऊपजि हिरदे राग ||


जदपि प्रिये! कँह संग मँह, होरी खेलहिं श्याम |
तदपि श्याम नहिं श्याम हँइ, श्यामा सम अभिराम||

बासंती अनुपम छटा, धारहिं सरसों फूल |
मोकूँ तोकूँ देखिअहिं, नहिं करि जावहिं भूल ||

छैयाँ गुलमौहरि चलहिं,रँग डारहु तुम आइ |
हों हू ऐसौ ही करहुँ, होरी लेंहु मनाइ ||

छ:बिसवाँ होली मिलन, रहे मना हम आज |
राधे सँग महिं श्याम जू, हिरदे करिअहु राज ||


लेहु बधाई आप सब, पुनि पुनि नेह समेत |
हिलि मिलि होरी खेलिहैं, शुभ समाज के हेत ||

गेहूँ जौ की बालियाँ, हँसि हँसि खेलहिं खेल |
अठखेली भँवरे करहिं,लगहिं अनूँठा मेल ||

मौसम की अस दूरियाँ, करअहिं हम इनु दूर |
गले मिलहिं ज़ख्मी संगे, अनीता यादव भरपूर||
                                डा0 सुदेश यादव जख्मी
                       mob. 9368666665

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