Monday, February 19, 2024

गजल

तन्हा तन्हा ठोकर खाता रहता हूं

मैं बिछडों को ही मिलवाता रहता हूं।


पास नहीं अपना बेगाना कोई भी

फिर भी सबके नाम गिनाता रहता हूं;


देखे हैं मंजर कितने बेकारी के

हूं मुफलिस और फांके खाता रहता हूं।


जो अपनों को खो बैठे बंटवारे में

मैं उन सबको गले लगाता रहता हूं।


अपनों ने हैं जख्म दिये इतने मुझको

मैं जख्मी दिन रात कराहता रहता हूं।

         डा. सुदेश यादव दिव्य

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