Friday, November 29, 2024

कल को ये रह जायेगी, संतान केवल नाम की

 आ रहा ऐसा जमाना, बात सुन लो काम की

कल को ये रह जायेगी, संतान केवल नाम की।


कल जिसे उंगली पकड चलना सिखाया आपने

अपने कांधे पर बिठा मेला दिखाया आपने

खुद बने घोडा मगर उसको हंसाया आपने

है खिलौना कौन सा जो ना दिलाया आपने

पर बडे होकर ना हरगिज ही संभालेंगे तुम्हें

जोर से बोले अगर तो मार डालेंगे तुम्हें

ये नहीं चिंता करेंगे तेरे सुख आराम की

कल को ये रह जायेगी, संतान केवल नाम की।


कलयुगी बेटे हैं ये शायद ना पालेंगे तुम्हें

सोचना मत ये बुढापे में संभालेंगे तुम्हें

सोचना मत गिर गये तो ये उठा लेंगे तुम्हें

सोचना मत रूठ जाओगे मना लेंगे तुम्हें

सोचना मत अपनी पलकों पर बिठा लेंगे तुम्हें

सोचना मत आश्रम में ये ना डालेंगे तुम्हें

वैसे तो बातें करेंगे राम की घनश्याम की

कल को ये रह जायेगी, संतान केवल नाम की।


जिन्दगी भर सारे रिश्तों को निभाया आपने

हार कर खुद ही तनय को भी जिताया आपने

कैसे जीवन को जिएं ये भी सिखाया आपने

थी अगर गुरबत मगर फिर भी पढाया आपने

जो असंभव था उसे भी कर दिखाया आपने

जब कभी भटका तो रस्ते पर भी लाया आपने

कौन सा वो ज्ञान था जो ना सिखाया आपने

दे दी पूरी पाठशाला बिन टका बिन दाम की

कल को ये रह जायेगी, संतान केवल नाम की।


बाल पन में जिनको बांहों में झुलाया आपने

खुद भले भूखे रहे सबको खिलाया आपने

हो गये बीमार पर फिर भी कमाया आपने

अपना दुख चेहरे पे आने से छिपाया आपने

सबको दी छाया मगर खुद को तपाया आपने

हर मुसीबत में ही रक्खा सर पे साया आपने

कर दिया जीवन हवन सोची नहीं आराम की

कल को ये रह जायेगी, संतान केवल नाम की।

डा. सुदेश यादव दिव्य उर्फ जख्मी

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